लेखक तपन कुमार चक्रवर्ती
अरावली पर्वतमाला उत्तर-पश्चिम भारत में एक पर्वत श्रृंखला है। जो 3 अरब साल पुरानी पर्वतमाला है। अरावली पर्वतमाला की कुल लम्बाई 692 मी. है। जो दिल्ली के पास शुरू होकर, दक्षिण हरियाणा और राजस्थान से गुजरते हुए अहमदाबाद (गुजरात) में समाप्त होती है । अरावली की सबसे ऊंची चोटी “गुरू शिखर” है । जिसकी ऊंचाई 1722 मी. है। जो राजस्थान के सिरोही जिले के “माऊंट – आबू” के पास स्थित है। पर्यावरण एवं वन प्रणियों की रक्षा के अलावा जंगल कटाई और अवैध खनन रोकने के लिए सरकार द्वारा गठित समितियों द्वारा अपने समय-समय पर सलाह एवं निर्देश दिये जाते रहे है। गौरतलब है कि विगत नवम्बर माह 2025 में पर्यावरण मंत्रालय की एक समिति द्वारा सुझाये गये सिफारिशों को देश के शीर्ष अदालत ने स्वीकार करते हुए परिभाषित के अनुसार 100 मी. से ऊंचाई को अरावली का “पर्वतमाला” मना गया है । जो सिद्धांतः एक अपरिपक्वता, अदूरदर्शी एवं मनमानी पूर्ण निर्णय है।
देश के पर्यावरणविदों एवं वन सुरक्षा समितियों ने शीर्ष अदालत द्वारा लिये गये अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा का तीव्र निंदा एवं विरोध दर्ज किये है। राजस्थान के जागरूक नागरिक मंच के साथ पर्यावरण व वन सुरक्षा समितियों द्वारा एकजुट होकर एक विशाल विरोध रैली का दिसम्बर माह में निकाली गई थी। पर्यावरणविदों का मानना है कि शीर्ष अदालत द्वारा मान्य किये गये समिति के सिफारिशों के अमल होने से अरावली के 100 मो. के नीचे सभी पर्वत को खनिज माफिया द्वारा खनन करते हुए अरावली पर्वतमाला को जमींदोज कर देगे। इसके अलावा दो या दो से अधिक पहाडो के बीच 500 मी. के अंतर को अरावली पर्वतमाला का हिंसा मानते हुए अन्य सभी पर्वतो से खनिज – खनन किया जावेगा। देश में 2016 से पहाड़ों से खनिज प्राप्ति के लिये भारत सरकार द्वारा खनन के लिए विवादित उद्योगपति एवं माइनिंग माफिया को अधिकार दे देये गये है। जिसके परिणामस्वरूप राजस्थान के अरावली पर्वतमाला को खनन के लिए निशाने पर लिया गया है।
अरावली पर्वतमाला के खनन होने से राजस्थान से आने वाली आधियों से रेत के टीले दिल्ली एवं हरियाणा में दिखेगें। इसके अलावा अरावली के जंगल कटाई होने से सभी हिंसक पशु राजस्थान के शहरों में प्रवेश कर लोगों को अपना शिकार बनायेगे इसके अतिरिक्त प्रकृति पर बुरा प्रभाव पडने के कारण समान्य जनजीवन पर इसका बुरा असर पडेगा । इसके अलावा राजस्थान के भूमिगत जलस्तर और नीचे चला जायेगा। जिसके फलस्वरूप राजस्थान के बावडी, नदी, तालाब, और कुए सुख जायेगे। नतीजन पीने का पानी का अभाव राजस्थान मे बढ़ जावेगा। इसके अलावा राजस्थान के फसलचक्र पर भी बुरा असर पड़ सकता है । भगौलिक विज्ञान के अनुसार पृथ्वी के सतह पर स्थित सभी शहर एवं गांवो की ऊंचाई समुद्र सतह से तुलना की जाती है। राजस्थान समुद्र सतह से 250 से 300 मी. ऊंचाई पर स्थित है । भगौलिक विद्वानो द्वारा अरावली के 100 मी. ऊंचाई की परिभाषा किस अधार पर गणना की गई है। यह समझ से परे है। स्वयं के फायदे के लिए माइनिंग माफियो द्वारा सराकर के पर्यावरण समिति पर मानसिक दबाव डालकर यह नई परिभाषा को सर्वोच्च न्यायालय से स्वीकृति दिलाई गई है। किंतु राजस्थान के पर्यावरणविंद एवं वन रक्षक समितियों के साथ स्थानीय नागरिको द्वारा लगातार धरना एवं विरोध प्रदर्शन के उपरांत ही सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीशो की अंतरात्मा से उठी अवाज से प्रभावित होकर अरावली पर्वतमाला पर खनिज – खनन हेतु सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने पुराने आदेश पर रोक लगा दिया है।
पूरे देश में 2014 के बाद जल, जमीन, जंगल, और वायुमण्डल की बिक्रीनामा से देश की जनता परेशान हो चुकी है। देश में व्यापार नीति अब बाहुबलियों द्वारा तय की जाती है। जो सिर्फ अपना अधिक से अधिक मुनाफे के लिए सरकार पर अनावस्यक दबाव डालते है । देश के सभी बंदरगाहो को सिर्फ एक विवादित उद्योगपति को देकर, नशा का बडा रैकट गुजरात से होकर बिहार, असम, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छ.ग. राजस्थान और हरियाणा प्रदेशो में पूरी तरह फैल चुकी है। देश के बेरोजगार युवको को इस जहरिले नशे के व्यापार में ढकेल दिया गया है। आश्चर्य की बात है कि देश की जनता चुप्पी साधे 5.0 किलो की मफ्त राशन के लाइन में खडी है।
26 सितम्बर 2025 को लद्दाख के महान वैज्ञानिक सोनम वांगचूक को “राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम’ के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिये गये है। वैज्ञानिक सोनम वांगचूक विगत सात महिनो से लद्दाख के बर्फ से ढकी पर्वतमाला एवं पर्यावरण को बचाने के लिए लद्दाख के 15000 हजार स्थानीय निवासियों के साथ शांतिपूर्वक धरना एवं अनशन पर बैठे थे। वैज्ञानिक सोनम वांगचूक का कहना है कि लद्दाख के पहाडो को सरकार द्वारा एक मात्र विवादित उद्योगपति को खनन करने के लिए जिम्मेदारी दी गई है। जिससे लद्दाख का पर्यावरण एवं प्रकृति का असतुलित हो जावेगा। और तो और मौसम चक्र में भी बुरा असर पडेगा । इसके अलावा देश में कभी भी चीन आक्रमण कर सकता है। चुंकि लद्दाख के ऊंची ऊंची बर्फ से ढकी पहाडो के कारण चीन भारत पर सहज रूप से आक्रमण नही कर पाता है। वैज्ञानिक सोनम वांगचूक का मांग है कि लद्दाख में छटवों अनुसूची ततकाल प्रभाव से लागू की जावे । जिससे लद्दाख के बर्फ से ढकी पर्वतमाला सुरक्षित हो जावे। वैज्ञानिक सोनम वांगचूक 2014 के आम चुनाव में देश के महामानव प्रधानमंत्री को सत्ता पर असीन कराने के लिए पूरे लद्दाख लोकसभा क्षेत्र में नंगे पाव घूम-घूम कर जनसंपर्क किये थे। मगर अफसोस की बात है कि वैज्ञानिक सोनम वांगचूक को देश के किस जेल में रखा गया है। इसकी जानकारी किसी को नही है। इसके अलावा देश के चुने हुए जनप्रतिनिधियों की चुप्पी को जनता देख रही है।