महाभारत और श्रीमद्भागवत में भगवान श्रीकृष्ण के कई अनन्य भक्तों का वर्णन है, जिन्होंने अपना सर्वस्व प्रभु को अर्पण कर दिया। कुरुक्षेत्र में जहाँ श्रीकृष्ण स्वयं अर्जुन के सारथी बने, वहीं द्वारका में भगवान के रथ की डोर जिस सेवक के हाथों में थी, वे थे—दारुक।
आइए जानते हैं प्रभु के इस परम सेवक की वह मार्मिक कथा, जो श्रीकृष्ण के पृथ्वी से विदा लेने (महाप्रयाण) के अंतिम क्षणों की साक्षी बनी।
कौन थे भक्त दारुक?
पुराणों के अनुसार, दारुक यदुवंश के एक सम्मानित व्यक्ति थे। जब द्वारका नगरी बसाई गई और भगवान के राजरथ के लिए एक योग्य सारथी की खोज हुई, तब दारुक ने बिना किसी राज-पद या धन की लालसा के प्रभु से केवल एक ही वरदान माँगा:
“प्रभु! मेरी एक ही अभिलाषा है कि जीवन भर आपके चरणों के समीप रहकर आपके रथ की लगाम संभालूँ।”
भगवान ने उनके निष्कपट प्रेम को स्वीकार किया और आजीवन उन्हें अपने साथ रखा। दारुक भगवान की हर यात्रा, युद्ध और दिव्य लीलाओं के प्रत्यक्ष साक्षी बने।
गांधारी का अचूक श्राप और यदुवंश का अंत
महाभारत युद्ध के पश्चात, पुत्र-शोक में डूबी माता गांधारी ने श्रीकृष्ण को श्राप दिया था कि जिस प्रकार कौरव कुल का नाश हुआ है, वैसे ही यदुवंश भी समाप्त होगा। समय का चक्र घूमा और 36 वर्ष बाद प्रभास क्षेत्र में वह श्राप फलित हुआ।
नियति और मदिरा के प्रभाव में सम्पूर्ण यदुवंश आपस में ही लड़कर समाप्त हो गया। चारों ओर केवल विनाश का दृश्य था:
टूटे हुए रथ और बिखरे हुए अस्त्र
रक्त से लाल हुई धरती
अपनों के ही हाथों अपनों का अंत
यह सब देखकर भी परम योगी श्रीकृष्ण पूर्णतः शांत थे और प्रभास क्षेत्र में एक विशाल पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यानमग्न बैठ गए।
दारुक का आगमन और विलाप
तभी धूल उड़ाता हुआ भगवान का दिव्य रथ वहाँ पहुँचा, जिसकी लगाम दारुक के हाथों में थी। वे प्रभु को खोजते हुए वहाँ आए थे। चारों ओर फैले विनाश और पीपल के नीचे अकेले बैठे अपने स्वामी को देखकर दारुक का हृदय काँप उठा।
वे दौड़कर प्रभु के चरणों में गिर पड़े और रोते हुए बोले—”प्रभु! यह कैसी लीला है? द्वारका उजड़ गई… सब चले गए। आइए प्रभु, रथ पर बैठिए, हम अभी द्वारका लौट चलते हैं।”
दिव्य अस्त्रों और रथ का स्वर्ग गमन
दारुक के विलाप के बीच एक अद्भुत घटना घटी। आकाश में दिव्य प्रकाश फैला और देखते ही देखते भगवान का रथ और उनके अस्त्र-शस्त्र स्वर्ग की ओर उठने लगे:
शार्ंग धनुष
पाञ्चजन्य शंख
कौमोदकी गदा
दिव्य अश्व
दारुक यह देखकर विस्मित रह गए और रो पड़े—”प्रभु! आपके अस्त्र भी आपको छोड़कर जा रहे हैं? अब मैं किसकी सेवा करूँ?”
श्रीकृष्ण का कठोर उपदेश और दारुक की विदाई
भगवान ने करुणा भरी दृष्टि से दारुक की ओर देखा और अपना अंतिम उपदेश दिया:
“दारुक, धैर्य रखो। इस संसार में जो जन्म लेता है, उसका अंत निश्चित है। मेरा पृथ्वी पर कार्य पूर्ण हो चुका है। अब तुम तुरंत द्वारका जाओ। अर्जुन से कहना कि वह द्वारका की स्त्रियों, बच्चों और बचे हुए लोगों को सुरक्षित हस्तिनापुर ले जाए। मेरे जाने के बाद द्वारका समुद्र में विलीन हो जाएगी।”
दारुक अपने स्वामी को उस एकांत वन में अकेला नहीं छोड़ना चाहते थे। उन्होंने काँपते स्वर में कहा—”मैं आपके बिना कैसे जीवित रहूँगा?”
परंतु श्रीकृष्ण ने समझाया—”सच्चा सेवक वही है जो कठिन से कठिन समय में भी स्वामी की आज्ञा का पालन करे।”
स्वामी की आज्ञा को सर्वोपरि मानकर दारुक भारी मन और आंसुओं से भरी आँखों के साथ द्वारका की ओर चल पड़े।
जरा शिकारी का बाण और लीला संवरण
दारुक के जाने के बाद, ‘जरा’ नामक एक बहेलिए ने दूर से भगवान के रक्तवर्णी चरण को हिरण समझकर बाण चला दिया। जब वह पास पहुँचा और अपनी भूल का अहसास किया, तो भय से काँप उठा। परंतु करुणासागर भगवान ने मुस्कुराकर उसे क्षमा किया, मोक्ष का आशीर्वाद दिया और अपनी मानवी लीला का समापन किया।
द्वारका का शोक और समुद्र में विलय
इधर दारुक ने जब द्वारका पहुँचकर यह शोक समाचार दिया, तो पूरी नगरी रुदन कर उठी। माता देवकी और पिता वसुदेव यह वियोग न सह सके और शीघ्र ही प्राण त्याग दिए। संदेश पाकर अर्जुन द्वारका आए, प्रभु का अंतिम संस्कार किया और बचे हुए लोगों को लेकर हस्तिनापुर निकल गए।