कोरबा। कटघोरा वनमंडल के जंगलों से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने हाथी-मानव संघर्ष की तमाम चिंताओं के बीच मां की ममता का बेहद खूबसूरत संदेश दिया है।
बम्हनी नदी के किनारे एक हथिनी ने नन्हे शावक को जन्म दिया। जन्म के बाद जब नन्हा शावक अपनी मां के पीछे चलने लगा तो नदी के रेतीले रास्ते में उसके छोटे-छोटे पैर बार-बार धंसने लगे।
नन्हे शावक की परेशानी मां से देखी नहीं गई। हथिनी ने आगे बढ़कर अपनी सूंड और पैरों से रेत हटानी शुरू कर दी। धीरे-धीरे उसने नन्हे शावक के लिए चलने लायक रास्ता बना दिया।
इसके बाद हथिनी आगे-आगे चलती रही और नन्हा शावक उसके पीछे-पीछे कदम बढ़ाता रहा।जंगल के इस दृश्य को जिसने भी देखा, वह कुछ पल के लिए ठहर गया।
न कोई भाषा, न कोई शब्द…
सिर्फ मां और बच्चे के बीच का वह रिश्ता, जिसे समझने के लिए शब्दों की जरूरत नहीं होती। इंसान हो या जानवर, मां की ममता हर जगह एक जैसी होती है।
कटघोरा के जंगल में बढ़ा हाथियों का कुनबा नन्हे शावक के जन्म के साथ ही कटघोरा क्षेत्र में हाथियों का कुनबा बढ़कर 52 हो गया है। वन क्षेत्र में हाथियों की बढ़ती मौजूदगी जहां जैव-विविधता और जंगल के लिए सकारात्मक संकेत मानी जा सकती है, वहीं दूसरी ओर हाथी-मानव संघर्ष वन विभाग और ग्रामीणों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
एक तरफ जंगल में हाथियों का कुनबा बढ़ रहा है, दूसरी तरफ इंसानों और हाथियों के बीच टकराव की घटनाएं चिंता बढ़ा रही हैं। ऐसे में बम्हनी नदी किनारे सामने आई मां हथिनी और उसके नन्हे शावक की यह तस्वीर उम्मीद जगाती है कि जंगल और इंसान के बीच सह-अस्तित्व का रास्ता जरूर निकलेगा।
ममता की यह तस्वीर खूबसूरत बनी रहे…
रेत हटाकर अपने बच्चे के लिए रास्ता बनाती हथिनी की यह कहानी सिर्फ एक वन्यजीव घटना नहीं, बल्कि प्रकृति की उस संवेदनशील तस्वीर का हिस्सा है, जिसमें मां अपने बच्चे की सुरक्षा के लिए हर मुश्किल आसान करने की कोशिश करती है।
आगे-आगे मां… पीछे-पीछे नन्हा शावक
जंगल की इस खूबसूरत कहानी में सबसे बड़ा सवाल यही है—ममता की यह तस्वीर यूं ही खूबसूरत बनी रहे और इंसान-हाथी संघर्ष का भी कोई ऐसा रास्ता निकले, जहां जंगल के हाथी भी सुरक्षित रहें और जंगल के आसपास रहने वाले इंसान भी।