बाल विवाह करो या फिर वेश्यावृत्ति… गुजरात के इस ‘वेश्या गांव’ की लड़कियों के सामने मानो यही दो रास्ते हैं. यह कोई बीते जमाने की कहानी नहीं, बल्कि आज की हकीकत है. यहां लड़कियों की सगाई महज सात साल की उम्र में कर दी जाती है, ताकि वे उस रास्ते पर जाने से बच सकें, जिस पर उनकी मां और दादी को जाना पड़ा.
अहमदाबाद से करीब 200 किलोमीटर दूर बनासकांठा जिले का वाडिया गांव लैंगिक समानता वाले आधुनिक भारत से बिल्कुल अलग दुनिया जैसा नजर आता है. यहां महिलाएं पीढ़ियों से उन भूमिकाओं से बाहर निकलने की कोशिश कर रही हैं, जो इतिहास ने उन पर थोप दी हैं. परंपरागत रूप से घुमंतू जनजाति के इस गांव में पीढ़ियों से महिलाओं को देह व्यापार के लिए मजबूर किया जाता रहा है, जबकि पुरुष उनके एजेंट के रूप में काम करते थे. यह सिलसिला आज भी जारी है.
अपनी रोजमर्रा की दिनचर्या के तहत करीब 750 की आबादी वाले इस गांव के पुरुष हर सुबह पालानपुर-थराद हाईवे की ओर जाते हैं. वे वहां काम की तलाश में नहीं, बल्कि ट्रक चालकों, राहगीरों और पड़ोसी गांवों व शहरों के पुरुषों को ग्राहक बनाने के लिए खड़े होते हैं.
कहा जाता है कि 1947 में भारत की आजादी के बाद सरानिया समुदाय के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया. विकल्पों की कमी के कारण वे आजीविका कमाने के लिए फिर देह व्यापार की ओर लौट गए. आज वाडिया के ग्रामीण अपने वर्तमान से लड़ते हुए भविष्य की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. लेकिन अतीत का साया अब भी उनके साथ है और वे ‘वेश्या गांव’ के तमगे से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं.