झारखंड का वह रहस्यमयी मंदिर, जहां आज भी गड़ा है परशुराम का फरसा

झारखंड। टांगीनाथ धाम सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था और रहस्य का अनोखा संगम है. परशुराम जयंती के मौके पर यह स्थान श्रद्धालुओं के लिए खास महत्व रखता है. यहां से जुड़ी मान्यताएं और कथाएं इसे भारत के रहस्यमयी तीर्थ स्थलों में शामिल करती हैं।

परशुराम जयंती का पर्व श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जा रहा है. भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है, जिनका उल्लेख रामायण और कई पुराणों में मिलता है. पौराणिक ग्रंथों के मुताबिक, भगवान परशुराम का जन्म ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका के घर हुआ था। ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बावजूद वे अद्भुत पराक्रमी योद्धा माने जाते हैं. शस्त्र विद्या में उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि उनका प्रमुख हथियार ‘फरसा’ ही उनकी पहचान बन गया और इसी कारण उन्हें परशुराम कहा गया।

रामायण से जुड़ी है इस धाम की कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, त्रेतायुग में राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता के स्वयंवर का आयोजन किया था. इस स्वयंवर में शर्त रखी गई थी कि जो शिवजी के पिनाक धनुष को उठाकर तोड़ देगा, वही माता सीता से विवाह करेगा. भगवान श्रीराम ने इस कठिन कार्य को पूरा किया और धनुष भंग कर दिया, जिसके बाद माता सीता ने उन्हें अपना वर चुन लिया. जब यह समाचार भगवान परशुराम तक पहुंचा कि शिवजी का धनुष टूट गया है, तो वे बेहद क्रोधित हो उठे।

क्रोध में भरकर वे तुरंत स्वयंवर स्थल पर पहुंचे. वहां उनकी लक्ष्मण से तीखी नोकझोंक भी हुई. लेकिन इसी दौरान उन्हें यह अहसास हुआ कि श्रीराम कोई साधारण मानव नहीं, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं। भगवान श्रीराम का यह सत्य जानकर परशुराम का क्रोध शांत हो गया और उन्हें अपने व्यवहार पर पछतावा हुआ।

उन्होंने भगवान श्रीराम से क्षमा मांगी और वहां से चले गए. कहा जाता है कि इसके बाद वे एक एकांत और घने जंगलों से घिरी पर्वत श्रृंखला में चले गए, जहां उन्होंने भगवान शिव की स्थापना कर कठोर तपस्या शुरू की. इसी दौरान उन्होंने अपना प्रिय शस्त्र, परशु (फरसा), भूमि में गाड़ दिया, जो आज भी उस तपस्थली से जुड़ा हुआ माना जाता है।

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