नई दिल्ली। लोकसभा-विधानसभा में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने का बिल, एक्सप्रेस स्पीड से मुद्दा बन गया. शुक्रवार शाम लोकसभा में यह विधेयक मतदान की कसौटी पार करने में चूक गया, लेकिन उतनी तत्परता से सत्ता पक्ष के बैनर-पोस्टर पर चढ़ गया. गृह मंत्री अमित शाह अपने भाषण में इसका इशारा पहले ही कर चुके थे. सोशल मीडिया कैंपेन शुरू हो गया है।
लोकसभा के गलियारों के बाद चुनावी रैलियों में ‘महिला आरक्षण’ के मुद्दे का सेंटर स्टेज लेना तय है. महिलाओं के लिए आरक्षण और परिसीमन सुनिश्चित करने के लिए मोदी सरकार द्वारा पेश किया गया संविधान संशोधन विधेयक दो-तिहाई बहुमत की दहलीज पार करने में नाकाम रहा. लेकिन इस विधायी विफलता के पीछे छिपी राजनीतिक पटकथा कुछ और ही कहानी बयां कर रही है. बिल का गिरना शायद एक ’रणनीति’ का हिस्सा था, जिसने भाजपा को विपक्ष के खिलाफ एक अचूक और धारदार चुनावी हथियार थमा दिया है।
जैसे ही बिल के गिरने की घोषणा हुई, सदन के भीतर और बाहर जो दृश्य दिखा, वह किसी सधे हुए नाटक से कम नहीं था. सत्ता पक्ष की महिला सांसद हाथों में तख्तियां और बैनर लिए विपक्ष विरोधी नारेबाजी करते हुए बाहर निकलीं. यह विरोध स्वतःस्फूर्त कम और पूर्वनियोजित अधिक लग रहा था. मानो बिल और तख्तियों पर मैसेज साथ-साथ ही छपवाए गए हों. संदेश साफ था- ’हमने महिलाओं के लिए कोशिश की, विपक्ष ने रोक दिया।’
एक घंटा 10 मिनट तक गृह मंत्री शाह का सदन में विपक्ष पर किया गया प्रहार इसी रणनीति की नींव था. उन्होंने न केवल विपक्ष की नीयत पर सवाल उठाए, बल्कि महिलाओं के हक के एकमात्र रक्षक के रूप में अपनी सरकार को पेश किया. इस आक्रामक तेवर से स्पष्ट था कि सरकार इस नतीजे के लिए पहले से मानसिक रूप से तैयार थी. अपने भाषण के बीच शाह यह भी बोल गए- ‘मैं जानता हूं कि ये वोट नहीं देंगे तो महिला आरक्षण बिल गिर जाएगा. लेकिन ये देश की महिलाएं देख रही हैं कि उनके रास्ते का रोड़ा कौन है’।